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बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई - Hindi-Urdu Poetry
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Author:  nahiaali [ Fri Jun 25, 2010 10:18 am ]
Post subject:  बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई - Hindi-Urdu Poetry

बरसे बगैर ही जो घटा घिर के खुल गई
इक बेवफा का अहद-ए-वफा याद आ गया
- खुमार बाराबंकवी



फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही जिंदगी हमारी है
- मिर्जा गालिब



हमें भी दोस्तों से काम आ पड़ा यानी
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक्त आया
- हरीचंद अख्तर



इन्सान अपने आप में मजबूर है बहुत
कोई नहीं है बेवफा अफसोस मत करो
- बशीर बद्र


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